Tuesday, 5 February 2013

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश 2013 जारी किया

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश 2013 जारी किया



राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने महिलाओं के विरुद्ध यौन हिंसा के मामलों से कारगर ढंग से निपटने के लिए एक आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश 2013 को 3 फरवरी 2013 को जारी किया. इसमें बलात्कार पीड़िता की हत्या के मामले में मृत्युदंड का प्रावधान किया गया. अध्यादेश पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह पूरे देश में लागू हो गया, लेकिन 6 माह के भीतर इस अध्यादेश को संसद से पास करवाया जाना अनिवार्य है.

इससे पहले केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने इस अध्यादेश को मंजूरी प्रदान की थी. 16 दिसंबर 2012 के दिल्ली सामूहिक दुष्कर्म मामले को देखते हुए सरकार ने न्यायाधीश जेएस वर्मा समिति का गठन किया था और महिलाओं के खिलाफ अपराधों से कारगर ढंग से निपटने के उपायों के बारे में रिपोर्ट देने का निर्देश दिया था.

अध्यादेश के मुख्य बिंदु:
• अध्यादेश में महिलाओं के खिलाफ सभी प्रकार के यौन अपराधों की परिभाषा का विस्तार करने के लिए बलात्कार शब्द के स्थान पर यौन हमले को आपराधिक कानून में शामिल करने का प्रवधान है.
• अध्यादेश में भारतीय दंड संहिता, आपराधिक प्रक्रिया संहिता और साक्ष्य अधिनियम जैसे अपराध कानूनों में संशोधनों को भी शामिल किया गया.
• अध्यादेश में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), दंड संहिता प्रक्रिया (सीआरपीसी) और साक्ष्य अधिनियम में संशोधन का प्रावधान है. इसमें महिलाओं का पीछा करने, ताक-झांक, तेजाब फेंककर हमला करने, अभद्र भाव भंगिमा यथा शब्दों और अनुचित तरीके से स्पर्श करने को लेकर सजा बढ़ाने का प्रावधान है.
• इसमे वैवाहिक बलात्कार को भी इसके दायरे में लाया गया है.
• अध्यादेश में बलात्कार के उन मामलों में मौत की सजा का प्रावधान किया है जिसमें पीड़िता की मृत्यु हो जाती है या वह स्थायी रूप से कोमा में चली जाती है. इस तरह के मामलों में न्यूनतम 20 वर्ष के कारावास की सजा का प्रावधान है, जिसे दोषी के आजीवन कारावास या मृत्यु तक बढ़ाया जा सकता है. इस संबंध में विशेषाधिकार न्यायालय को प्रदान किया गया.
• 18 साल से कम उम्र की महिलाओं का आरोपी के साथ आमना-सामना नहीं कराया जाएगा लेकिन जिरह के प्रावधानों को बरकरार रखा गया है.
• अगर कोई सरकारी सेवक यौन अपराध के मामले में सहयोग नहीं करता है या कानूनी प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाता है तो उसे कारावास की सजा देने की सिफारिश की गई है.
• अगर तेजाब हमले का सामना कर रही महिला आत्मरक्षा में आरोपी की हत्या कर देती है तो उसे आत्मरक्षा के अधिकार के तहत सुरक्षा मिलेगी.

भारत के संविधान का अनुच्छेद 123:

भारत के संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति को उस समय अध्यादेश द्वारा विधान बनाने की शक्ति है जब उस विषय पर तुरंत ही संसदीय अधिनियमिति बनाना संभव नहीं है.

मीडिया स्वनियमन ढकोसला है : मार्कण्डेय काटजू



मीडिया स्वनियमन ढकोसला है : मार्कण्डेय काटजू

अभिमन्यु कुमार
नई दिल्ली, १६ जनवरी
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा स्वनियमन की वकालत करना और उसका अभ्यास करना, सामाजिक ज़वाबदेही से बचने की एक चाल है”. ये बातें पूर्व न्यायमूर्ति और प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू ने भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली में आयोजित एक सम्मेलन में कही. सम्मेलन का विषय मीडिया पर स्वनियमन बनाम वैधानिक नियमन था। उन्होने कहा कि पूर्ण रूप से अनियंत्रित इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जन सारोकार के मुद्दे के प्रति सही ढ़ंग से अपनी जिम्मेदारी नही निभा रहा है बल्कि पैसे की उगाही में ज्यादा ध्यान दे रहा है. ज़ी न्यूज-जिंदल विवाद इसका उदाहरण है. उन्होने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से पेड न्यूज और अन्य कमियों को दूर करने के लिए भारतीय प्रेस परिषद् को मीडिया परिषद् में परिवर्तित कर दिया जाना चाहिए. मीडिया परिषद् प्रभावी ढंग से काम कर सके इसके लिए उसे कड़ी सजा देने और लाइसेंस को रद्द करने के अधिकार देने चाहिए.
काटजू ने आगे कहा कि मीडिया देश के वास्तविक मुद्दों जैसे गरीबी, कुपोषण आदि पर बात नही करता. वह सनसनी फैलाने वाले कार्यक्रम प्रसारित कर टीआरपी बढ़ाने की जुगात में लगा रहता है. उन्होंने अन्ना हजा़रे के आन्दोलन का उदाहरण देते हुए कहा कि मीडिया ने इस आन्दोलन को सनसनी तौर पर खड़ा किया जिसका अंतिम परिणाम शून्य रहा. क्या इस आन्दोलन के बाद देश से भ्रष्टाचार एक प्रतिशत भी कम हुआ? उन्होंने दिल्ली सामूहिक बालात्कार मामले के टीवी कवरेज पर भी प्रश्न खड़े किये और कहा कि लगातार पंद्रह दिनों तक दिन-रात इस मुद्दे को दिखाना उचित था? क्या उन पंद्रह दिनों में देश भर में यही एक मुद्दा था?
उन्होने पेड न्यूज के मुद्दे पर कहा कि मीडिया पेड न्यूज को रोकने का प्रयास नही करती है, उल्टा इसे बढ़ावा दे रही है.
काटजू ने अंत में मीडिया काउंसिल के रुप में अधिकार प्राप्त स्वायत्त संस्थान की स्थापना को समय की आवश्यकता बताया जो बेलगाम मीडिया पर अंकुश लगा सके, उसके गलतियों पर उसे दंडित कर सके और जरुरत पड़ने पर उनके लाइसेंस को रद्द कर सके.
सम्मेलन में वरिष्ठ पत्रकार और द हिंदू के पूर्व संपादक एन. राम ने काटजू की बातों पर सहमति जताते हुए कहा कि प्रत्येक मीडिया संस्थान को एक स्वतंत्र लोकपाल रखना चाहिए जो समाचार पत्रों और चैनलों की सामग्री पर नज़र रख सके. द हिंदू इस नीति का पालन करता है  दूसरे संस्थानों को भी इस नीति का पालन करना चाहिए. तभी मीडिया संस्थान जनता के प्रति उत्तरदायी बना पायेगा. एन राम ने मीडिया पर सरकारी नियंत्रण को ख़ारिज करते हुए कहा कि सरकारी नियंत्रण अभिव्यक्ति की आज़ादी को प्रभावित करेगा. उन्होने स्व नियमन को निरंकुश बताया.
अंग्रेजी समाचार चैनल हेडलाइंस टुडे के प्रबंध सम्पादक राहुल कंवल ने स्वनियमन के पक्ष में  कहा कि मीडिया की अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा स्वनियमन ही कर सकता है. राष्ट्रीय प्रसारण मानक संघ (एनबीएसए) समाचार चैनलों के सामग्री पर कड़ी नज़र रखता है और चैनल की गलतियों पर उसे दंड भी देता है. इस संस्थान ने कई चैनलों के खिलाफ कड़े फैसले भी सुनाये हैं. मीडिया पर सरकारी नियंत्रण सेंसरसिप लगाने और उसकी अभिव्यक्ति पर अकुंश लगाने जैसा होगा. सरकारी नियंत्रण या सरकार के अधीन स्वायत्त संस्थान यदि मीडिया का नियमन करेगी तो निजी चैनल दूरदर्शन की तरह काम करने लगेगा और सरकारी अधिकारी उन्हें बतायेंगे कि क्या दिखाना है और क्या नही. मीडिया का स्वनियमन ही अभिव्यक्ति की आजादी को खतरे से दूर रख सकता है.
किसी मुद्दे को सनसनी के रुप में प्रस्तुत करने के आरोप पर राहुल कंवल ने कहा कि दिल्ली सामूहिक दुष्कर्म मामले में मीडिया ने युवाओं के गुस्से को महसूस किया और उसे देश के सामने रखा जिसका साकारात्मक प्रभाव सब के सामने है. इतना ही नही मीडिया की साकारात्मक पहल के कारण ही आज समाज भ्रष्टाचार और महिला आजादी पर खुलकर बात कर रहा है.
मार्कण्डेय काटजू ने राहुल कंवल की एनबीएसए के कार्यों की प्रशंसा पर सवाल उठाते हुए कहा कि एनबीएसए को लाइसेंस रद्द करने के अधिकार होने चाहिए तभी यह सही मायने में कार्य कर पायेगी. जब तक चैनलों में लाइसेंस रद्द होने और कड़े दंड का डर नही होगा तब तक समाचार चैनल बकवास काम करता रहेगा. एन. राम ने सलाह दिया कि सारे कार्यरत मीडिया कर्मी को एनबीएसए से त्यागपत्र दे देना चाहिए तभी यह सही मायने में स्वनियमन कर सकेगा. नही तो व्यवसायिक हित हमेशा समाजिक हित पर हावी रहेगा.
राजनीतिक समाजशास्त्री दिपांकर गुप्ता ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि मीडिया क्या न करे इसकी भी परिभाषा तय की जानी चाहिए. उन्होने कहा कि एनबीएसए टीवी पत्रकारिता को उत्तरदायी बनाने की दिशा में बेहतर काम कर रहा है.
सीएसडीएस के परियोजना निदेशक विपुल मुद्गल ने कहा कि देश में लगभग ३०० चैनल राजनेताओं के पास है जिसका प्रयोग वे जनमत को प्रभावित करने के लिए करते हैं. उन्होने मीडिया संकेंद्रन पर भी चिंता जाहिर की. स्वनियमन के मुद्दे पर कहा कि मीडिया वैधानिक समर्थन प्राप्त स्वतंत्र संस्थान के अधीन काम करे. उन्होंने जोर देकर कहा कि पहले नियमन और बाद में स्वनियमन की बात की जानी चाहिए। मुद्गल के मुताबिक मीडिया का नियमन जनता द्वारा किया जाना चाहिए। उन्होंने ब्राजील का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां पर मीडिया के लिए एक सिविल चार्टर बनाया गया है जो मीडिया पर जनता का नियंत्रण स्थापित करता है। उन्होंने कहा कि स्वनियमन वैधानिक ढांचे के भीतर ही होना चाहिए.
सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रुप में देश के पूर्व मुख्य न्यायधीश एम.वेंकटचलैया ने कहा कि वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए मीडिया के लिए नियामक संस्थान की आवश्यकता है. सरकारी नियंत्रण  मीडिया के स्वतंत्र विचारों पर अंकुश लगा सकता है. उन्होने आगे कहा कि भले ही हमारे बीच कितने मामलों पर असहमति हो लेकिन इस पूरे मुद्दे पर जरूर सहमति है कि मीडिया का नियमन सरकार के द्वारा नहीं किया जाना चाहिए।  

Saturday, 8 December 2012

Monday, 3 December 2012


हम युवा का विवाह जब अपने से इतर जाति की प्रेमिका से नही होता है तो हम रोते-बिलखते हैं. उसकी बिछड़न की दुख में मरने को तैयार रहते हैं. ऐसे में जाति बड़ा या प्रेम? फिर हम जातिगत राजनीति में सक्रिय क्यों है?


जातिवाद के अंतर्दंद 
        में युवा
अभिमन्यु कुमार
लगता है जाति और धर्म का दंश अगली पीढ़ी को भी झेलना पड़ेगा. मन में 440 वोल्ट के सामान उर्जा थी कि हम युवा देश को बदल देंगे लेकिन समकालीन युवा को जातिगत ओछी राजनीति करते देख मेरी उर्जा 12 वोल्ट की हो जाती है. अगर हम युवा ऐसी ही विचारधारा की नैया खेते रहेंगे तो अगली पीढ़ी भी जातिवाद के समंदर में डूब जायेगी.
देश में कई ऐसे उदाहरण पड़े हैं जिसमें दलित नेता और लाल नेता सत्ता प्राप्ति के बाद उसके सुख की हरियाली में इतने खो जाते हैं कि लाल और ब्लू रंग की विचारधारा गायब हो जाती है. बात साफ़ है कि जाति रुपी मोहरे को इसलिए जीवित रखा जाता है ताकि अपनी व्यक्तिगत मंशा को पूरा किया जाए. वे नोट की माला पहनते हैं. वे फाईव स्टार जन्मदिन मनाते हैं. और जो टुट-पुंजिया नेता हैं, जो इस तरह की चाहत रखते हैं वे दलित शब्द को साध्य और युवाओं को साधन बनाकर अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा साध रहे हैं. वे प्रेम रुपी महत्वकांक्षा से इनके कोरे मन को धोते हैं. फिर इतिहास की हड्डियां नोचते हैं और उनके मन में इस बात को घर कर देते हैं कि जातिगत राजनीति से ही उनका उद्धार संभव है. वे इनके जरिये अपनी विचारधारा को लोगो तक पहुंचाते हैं और इनके कंधे पर बंदूक रख कर अपनी मंशा पूरी करते हैं. आश्चर्य की बात यह है कि हम समझदार युवा भी इनके चंगुल में फंस जाते हैं.
आज बुरे वक्त में जब अपने भी साथ छोड़ देते हैं तो इन नेताओं का प्यार कितना प्रासांगिक है. यह बड़ा प्रश्न है.
कुछ दिन पहले मेरे एक दलित दोस्त ने एक ऐसे ही सम्मोहित दलित युवा की विचारधारा में असहमति जताई तो उसने झल्लाते हुए मेरे दोस्त को कहा कि ये नया ब्राह्मन है. क्या दलित शब्द किसी की जागीर है. इस वाकया से साफ संदेश मिलता है कि आज दलित शब्द एक कौमोडिटी के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है.
इससे पहले कि आप मुझे दलित विरोधी समझे, मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि युवा सिर्फ लाल और नीला झंडा फहराने के लिए ही निशाना नही बनाएं जा रहे हैं. उनपर सवर्ण और क्षत्रिय होने की मांसिकता को हेपनोटाइज़ विधि द्वारा घर किया जा रहा है. ऐसे हेपनोटाइज़्ड युवा बड़े गर्व से कहते फिरते हैं कि वे भगवान राम के वंशज हैं. बाद में ये नशा करते हैं और आँखे दो-चार करने की जगह सात-आठ भी करते हैं. अब बताइए कि भगवान राम की मर्यादा कहाँ है इनमें?  क्षत्रिय युवा छाती चौड़ा कर बोलते हैं कि वे ब्रह्मा के बाजू से पैदा हुए हैं. अगर वे इतने ही ताकतवर होते हैं तो मुझे यह बात समझ में नही आती है कि मेरे एक क्षत्रिय मित्र रोज बाँडी सप्लिमेंट खाकर जिम क्यों जाता है और सलमान ख़ान बनने की चाहत क्यों रखता है? उसे नही जाना चाहिए न? अगर सच में क्षत्रिय के पास ही ताकत है तो भारतीय सेना में दलित या सवर्ण नही होते. हम यदि विदेशी दुश्मनों से चिंतामुक्त होकर चैन की नींद सो पाते हैं तो उसमें सभी जातियों का योगदान होता है.
बात स्पष्ट है कि आज सत्ता लोभी नेता युवा को जातिवाद का टॉनिक इसलिए पिला रहे हैं ताकि उनकी संकीर्ण राजनीतिक महत्वकांक्षा मजबूत हो.

एक बात और मुझे आश्चर्य में डालता है कि जब हम युवा को अपने से इतर जाति की प्रेमिका से प्रेम विवाह सफल नही होता है तो हम रोते-बिलखते हैं. उसकी बिछड़न की दुख में मरने को तैयार रहते हैं. अब भाई साहब मुझे ये बताओ कि जाति बड़ा या प्रेम? अब क्या हम ये चाहेंगे कि जिस दंश को हम झेले हैं या झेल रहे हैं उसे अगली पीढ़ी भी झेले? अगर हम इस कुसंस्कृति को यहीं खत्म नही करेंगे तो आने वाला समय आज से भिन्न नही होगा. हमें अपने भविष्य और इस तुच्छ राजनीति में से किसी एक को चुनना होगा. यही समय की आवश्यकता है .
                     

                     


Wednesday, 28 November 2012

वेब पत्रकारिता का चमकता भविष्य

 वेब पत्रकारिता
     का
चमकता भविष्य

अभिमन्यु कुमार

सूचना और संचार क्रांति के दौर में आज प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के बीच वेब पत्रकारिता का चलन तेजी से बढ़ा है और अपनी पहचान बना ली है. अखबारों की तरह बेव पत्र और पत्रिकाओं का जाल, अंतरजाल पर पूरी तरह बिछ चुका है. छोटे-बड़े हर शहर से अमूमन बेव पत्रकारिता संचालित हो रही है. छोटे-बड़े सभी शहरों के प्रिंट व इलेक्ट्रानिक मीडिया भी वेब पर हैं. इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि भारत में थोड़े ही समय में इसने बड़ा मुकाम पा लिया है. हालांकि समर अभी शेष है और भविष्य उज्जवल.

क्या होती है वेब पत्रकारिता

जिस प्रकार अखबारों, पत्रिकाओं में खबरों के चयन, संपादन या लेखन होते हैं. यही कार्य यदि इंटरनेट पर किया जाता है तो वेब पत्रकारिता कहलाता है.

खुबियाँ

वेब पत्रकारिता एक ऐसा माध्यम जो अपने अंदर प्रिंट, टीवी और रेडियो को समेटे है. मीडिया का लोकतंत्रीकरण करने में वेब पत्रकारिता बड़ी भूमिका निभा रहा है. संचार माध्यम के रूप में इस प्लेटफार्म ने हर आदमी का आवाज बुलंद कर हजारों-करोड़ो लोगो तक पहुंचाया है. पहले जहां इंटरनेट कम्प्यूटर तक सीमित था, वहीं नई तकनीकों से लैस मोबाइलों, स्मार्ट फोन और टैब में भी इंटरनेट का चलन बढ़ता जा रहा. किसी भी जगह कहीं भी इंटरनेट का इस्तेमाल किया जा सकता है. यह वेब पत्रकारिता का ही कमाल है कि आप दुनिया के किसी भी कोने में बैठकर किसी भी भाषा में, किसी भी दिन और किसी भी देश का अखबार या खबरें पढ़ सकते हैं. यह ख़बरों का तीब्र माध्यम के रूप में भी स्वीकारा गया है.


चुनौती और समस्या
पहली बड़ी चुनौती कम्प्यूटर साक्षारता दर की है. दूसरी चुनौती भारत में अभी भी वेब पत्रकारिता की पहुंच अगली पंक्ति में खड़े लोगों तक ही सीमित है. इधर के दिनों में यह मध्यम वर्ग तक भी आया है. जहां तक अंतिम कतार में खड़े लोगों तक पहुंचने की बात है तो अभी यह कोसों दूर है. हालांकि अंतरजाल मुहैया कराने वाली कंपनियों ने मोबाइल फोन और ग्रामीण क्षेत्रों पर ज्यादा ध्यान दिया है और इंटरनेट अब गांवों तक पहुंच गया है. तीसरी चुनौती पत्रकारों के समक्ष तकनीकी ज्ञान की है. अन्य चुनौती के रूप में वेब पत्रकारिता में सबसे बड़ा सवाल विश्वसनीयता को लेकर भी है. आज लोगों को इतनी जगहों से समाचार मिल रहे हैं कि लोगों के लिए समाचारों की विश्वसनीयता एक बड़ा मुद्दा है. यह वेब पत्रकारिता के लिए भी एक बड़ी चुनौती है.

भविष्य
आज वेब-संस्करण चलाने बाली समाचार-पत्र और पत्रिकाओं की संख्या कम है. भविष्य में हर पत्र-पत्रिका ऑन-लाईन होगी. साथ ही साथ स्वतंत्र न्यूज पोर्टल की संख्या में भी वृद्धि होगी. पत्रिका न्यूज वीक ने अपने प्रिंट संस्करण को बंद कर ऑनलाईन संस्करण जारी रखने का फैसला किया है. जनसत्ताके बारे में यह आसार लगाया जा रहा है कि समाचार-पत्र घाटे से बचने के लिए प्रिंट संस्करण बंद कर ऑन-लाईन से अपनी सेवा जारी रखेगा. बात स्पष्ट है कि जिस पत्र का लक्षित समूह उच्च वर्ग है और जिनके पास इंटरनेट आसानी से उपलब्ध है, वह धीरे-धीरे प्रिंट संस्करण बंद कर पूर्ण रूप से ऑन-लाईन हो जायेगा.
वर्ल्ड बैंक के मुताबिक 2011 तक भारत में 12.5 करोड़ लोग इंटरनेट इस्तेमाल कर रहे थें जिसकी संख्या में तीव्र वृद्धि होगी.
वेब पत्रकारिता का उज्जवल भविष्य इस बात से भी आंका जा सकता है कि भारत में मोबाइल तकनीक और फोन सेवा प्रदान करने बाले बड़े टेलिकॉम ऑपरेटरों ने 3G सेवाओं के लाइसेंस के लिए हाल ही में करीब 16 अरब डॉलर यानी 75,600 करोड़ रुपए की बोली लगाई.
पहुंच
वेब पत्रकारिता की पहुंच एक निश्चित भौगोलिक सीमा तक नही है अपितु इसकी पहुंच वैश्विक है. वेब पत्रकारिता करने वालों का दायरा बहुत बड़ा हो जाता है. उनकी ख़बर एक पल में सारी दुनिया में पहुँच जाती है जो कि अन्य समाचार माध्यमों में संभव नहीं है.

वेब पत्रकारिता को पेशा बनाने बालो के लिए ध्यान रखने योग्य बातें
1. हिंदी इनस्क्रिप्ट की बोर्ड की जानकारी हो
2. यूनिकोड फाँट तकनीकि पर काम करें
3.वेब पत्रकारिता के समाचार सूचनापरक होना चाहिए. वाक्य छोटे होने चाहिए.
4.सर्च इंजन का की-वर्ड समाचार में कम से कम दो-तीन बार जरूर लायें.
5. कुछ की-वर्ड समाचार के हेड-लाईन में भी जरूर लायें.
6. समय का ख्याल रखें- आज, कल और परसो से बचें
7.संस्था का नाम भी समाचार में जरूर लायें.
8.Active-Voice में ख़बरों को लिखें.
9.तीसरे या चौथे पाराग्राफ के बाद समाचार का बैक-ग्राउंड दें.
10.तस्वीरें और ग्राफिक से पेज को सजायें
11. संदर्भ और स्रोत का भरपूर उपयोग करें.