Tuesday, 22 October 2013




 रहमानइश्क

दिल से... जय हो



अंधेरी रात... चारों तरफ तेज चहलकदमी। ऐसा लग रहा था जैसे पूरा जयपुर सिकर रोड स्थित भवानी निकेतन ग्राउंड की ओर बढ़ रहा हो. हजारों की तादाद में लोग थे मगर कोई अव्यवस्था नहीं। प्राय: 8 बजे के बाद जयपुर की सड़कें शांत होने लगती है मगर रविवार (20.10.13) को नजारा ही कुछ और था।ग्राउंड के आसपास के रास्तों में ट्रैफिक की चहलपहल तेज थी। धीरे धीरे पूरा ग्राउंड भरा गया... सब इंतजार में शांत बैठे थे। अचानक आवाज आई... दिल से रे..... और पूरा ग्राउंड उछल पड़ा। ए. आर. रहमान के आवाज का जादू पूरे समां में एक ऊर्जा की तरह दौड़ गया। जैसे ही रहमान ने साज छेड़ा तो ऐसा लगा कि गुलाबी नगरी जयपुर और गुलाबी हो गई हो। बेशक रहमान एक जादूगर हैं। जादूगर इसलिए क्योंकि जब उन्होंने अल्लाह की शान में सूफियाना गीत कुन फया कुन और ख्वाजा मेरे ख्वाजा पेश किया तो क्या हिंदू क्या मुस्लिम सब उनकी ताल से ताल मिलाने । ये कलाकार के कला की शक्ति ही है जो जात-पात, धर्म-संप्रदाय का भेद खत्म कर देता है। रहमान एक कलाकार हैं। वे संगीत को जीते हैं और उसी में भगवान को देखते हैं।

रहमान एक कन्सर्ट में गा रहे थे जिसका नाम था ‘रहमानइश्क’। ये कन्सर्ट कई शहरों से होकर जयपुर आया था। रहमान ने लोगों के सामने संगीत के प्रति अपने इश्क को जाहिर किया। संगीत को जीने वाले रहमान ने एक से बढ़कर प्रस्तुतियां दी। जब रहमान के कांपोजिशन ताल से ताल मिला... पर सुखविंदर ने अपनी आवाज दी तो ऐसा प्रतीत हुआ जैसे पूरी फिज़ा उनके ताल में रम गई हो। हजारों लोगों के तालियों की गडगडाहट ने समा को ऐतिहासिक बना दिया। मस्ती की पाठशाला... पर युवाओं ने खूब डांस किया। मस्ती वाले गाने के बाद जब शहनाई बजती है ये जो देश है मेरा... स्वदेश है मेरा... तुझे है पुकारा... माहौल एकाएक शांत हो गया। देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत सब ऐसे रमे कि सबने अपने हाथों को ऊपर कर लिया और झूमने लगे ये रहमान जादू ही था


रांझना फिल्म के गीतों ने मुझे जहां आईआईएमसी की यादों को आंखों के सामने ला कर रख दिया वहीं सूफियाना गीतों में मैंने अध्यात्म के गोते लगाए। कुछ घंटों के कार्यक्रम में दर्शकों के कई व्यक्तित्व को रहमान के गीतों ने उभारे कभी वे नाचते, कभी वे देश रंग में रंग जाते, कभी रूमानी होते तो कभी अध्यात्म में डूब जाते। यह रहमान के संगीत की ही ताकत है जो आपके इतने सारी व्यक्तित्व को कुछ पलों में सबके सामने ला देता है। रहमान के संगीत से इश्क को लोगों ने महसूस किया। तीन घंटे तक चले इस सुरों के कारवां का आखिरी पंद्राह मिनट और भी जोशीला रहा। सुखविंदर के गीत चल छैया छैया ने लोगों को खूब नचाया वही जय हो... ने दर्शकों को देशभक्ति की भावना को फील कराया। जय हो... के वक्त आसमान में रंग-बिरंगी आतिशबाजी ने समां को और भी जोशीला बना दिया। हजारों तारे उस रात का गवाह बने। तू ही रे... पर जयपुर के िसितार वादक पंडित विश्वमोहन भट्ट के साथ रहमान की जुगलबंदी ने प्यार के सागर की गहराइयों में डूबने को मजबूर कर दिया। रहमान के पिटारे में हमेशा कुछ होता है। राजस्थान की संस्कृति से जुड़ा पधारो म्हारे देश को आधुनिक वाद्य यंत्रों से रहमान ने और भी खूबसूरत टच दिया।

तकनीक के मामले में रहमान का सतरंगी स्टेज भी अगल रहा। स्टेज के बैक में एलईडी स्क्रीन लगाई गई थी जो प्रस्तुत हो रहे गाने के विजुअल के जरिए माहौल को और भी आकर्षक बना रही थी।















Monday, 22 April 2013

दिल्ली फिर शर्मसार
चार महीने पहले दिल्ली में चलती बस में एक युवती के साथ बर्बर तरीके से हुए सामूहिक बलात्कार के बाद देशभर में व्यवस्था के खिलाफ लोगों का जैसा गुस्सा फूटा था, वैसा ही एक बार फिर नजर आ रहा है। यह अजीबोगरीब संयोग ही है कि जिस दिन देश की राजधानी दिल्ली को सरकारी स्तर पर "दिलदार दिल्ली" की नई पहचान दी गई, उसी दिन दिल्ली को दागदार बनाने वाली एक और वीभत्स व रोंगटे खड़े कर देने वाली वारदात को अंजाम देते हुए एक पांच वर्षीय मासूम बच्ची को दुष्कर्म का शिकार बनाया गया। दुर्भाग्य से देश के बाकी हिस्सों की स्थिति भी दिल्ली से अलग नहीं रही। मध्य प्रदेश के सिवनी और दतिया, उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर तथा महाराष्ट्र के नागपुर में भी पांच से सात वर्ष की चार बच्चियों को इसी तरह दरिदंगी भरे दुष्कर्म का शिकार बनाया गया। चार महीने पहले दिल्ली में हुई सामूहिक बलात्कार की वारदात ने देश में कानून-व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त बनाने की जरूरत के साथ ही महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों को रोकने के लिए सख्त कानून और पुलिस सुधार की जरूरत को भी शिद्दत से रेखांकित किया था। सरकार ने सख्त कानून बनाने की पहल तो की, लेकिन पुलिस सुधार की दिशा में कुछ नहीं हुआ और इसके लिए कोई एक पार्टी या सरकार नहीं, हमारी समूची राजनीति दोषी है। यही वजह है कि पुलिस का अमानवीय चेहरा हर बार की तरह इस बार भी अपने डरावने अंदाज में सामने आया। दिल्ली, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश की ताजा घटनाओं ने इस बात को भी गहराई से रेखांकित कर दिया है कि इस समस्या का इलाज कानूनों को सख्त बनाकर ही नहीं किया जा सकता। दरअसल अबोध बच्चियों के साथ दुष्कर्म की ये घटनाएं बीमार मानसिकता की उपज हैं और इस मनोरोग को फैलाने में टेलीविजन पर दिखाए जाने वाले विज्ञापन और सीरियल सहित कई कारक अपनी भूमिका अदा कर रहे हैं। अफसोस और हैरानी की बात यह भी है कि हमारे समाज में मनोरोगियों को उस तरह से रोगी माना ही नहीं जाता, जिस तरह दूसरे रोगियों को माना जाता है। इसलिए ये घटनाएं समाज से अपने गिरेबां में झांकने की मांग भी करती हैं।

Monday, 18 March 2013


भाषायी अधिकारों पर प्रश्नचिंह


सिविल सेवा परीक्षाओं में भारतीय भाषाओं को दरकिनार कर अंग्रेजी का वर्चस्व कायम करने के संघ लोक सेवा आयोग के फैसले पर देश में तीखी प्रतिक्रिया हुई. इस मुद्दे पर पिछले हफ्ते संसद में भी गतिरोध रहा. लगभग सभी ने इस पर नराजगी जताई. कड़े विरोध को देखते हुए कार्मिक राज्यमंत्री वी नारायणसामी ने ऐलान किया कि इस मसले का समाधान निकलने तक आयोग की नई अधिसूचना लागू नही की जायेगी.
दरअसल मामला तब भड़का जब संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में अंग्रेजी 100 अंक का कर दिया गया और इसमें प्राप्त अंक योग्यता निर्धारण में जोड़े जाएंगे. जबकि पहले अंग्रेजी में सिर्फ पास होना होता था. यही नहीम, किसी भी भारतीय भाषा को दशवीं तक के ज्ञान की अनिवार्यता को भी अधिसूचना से हटा दिया गया . यह निश्चित तौर पर भारतीय भाषाओं का अपमान है साथ ही साथ अंग्रेजी को तरजीह देने की कोशिश है. अंग्रेजी आज भी ग्रामीण छात्रों की कमजोरी रही है. इस अधिसूचना के लागू हो जाने से उनके सपनों पर ग्रहण लग जाता.
इस मुद्दे पर संसद में हिंदी के साथ-साथ तमिल सांसदों ने भी विरोध जताया. जयललिता पहले ही खत लिखकर इसका विरोध जता चुकी है.
आज अंग्रेजी का वर्चस्व इतना बढ़ गया है कि न्यायालय से लेकर प्रशासनिक कार्यों में अंग्रेजी का इस्तमाल होने लगा है. उच्च शिक्षा के साथ-साथ स्कूली शिक्षा में अंग्रेजी का बोलवाला बढ़ा है. एक लोकतांत्रिक देश में भाषायी अधिकारों को इस तरह दबाना औ फिरंगी भाषा को इस तरह तरजीह देना कितना उचित है?

Friday, 8 March 2013


अभी बदलाव बाकी है
पहली बार महिला दिवस २८ फरवरी १९०९ को मनाया गया था संयुक्त राज्य अमेरिका में। तब यह सिर्फ वहां का एक राष्ट्रीय दिवस था, जिसकी संकल्पना सोशलिस्ट पार्टी ऑफ अमेरिका ने की थी। धीरे-धीरे और भी देश इससे जुड़ते गए। सन्‌ सतहत्तर के बाद तो संयुक्त राष्ट्र महासभा ने ८ मार्च का दिन इसके लिए तय ही कर दिया। एक ऐसा दिन, जब महिलाओं के अधिकारों की बात उठाई जाए, फिर उन्हें पूरे साल चलाया जाए। १९९६ से संयुक्त राष्ट्र कोई एक थीम भी देता आ रहा है, जिसके तहत उस पूरे वर्ष एकाग्रता से महिला अधिकार संबंधी उस खास विषय पर काम किया जा सके। महिलाएं और निर्णय के अधिकार, महिलाएं और मानवाधिकार, बराबरी का हक, हिंसा से मुक्ति, समान अवसर, महिलाओं पर निवेश, उन्नति का समान अधिकार आदि विषयों पर इसी नाते पिछले सालों में काम किए गए हैं। २०१२ की थीम ग्रामीण महिलाओं का सशक्तीकरण थी। इस साल की थीम है "वादा तो वादा है, इसे निभाना है", यानी महिलाओं के प्रति की जाने वाले हिंसा के निराकरण का वादा निभाना। 

भारतीय महिलाएं खुशकिस्मत हैं कि उन्हें देश और संविधान के साथ ही मताधिकार मिल गया। हमारा संविधान स्त्री-पुरुष को बराबरी का दर्जा देता है। मगर हमारी सामाजिक स्थितियां इस कागज पर लिखे को पूरी तरह सच साबित नहीं करतीं। हां, शहरी महिलाओं की स्थिति काफी बदली है, मगर इसे सतह पर तैरता मक्खन ही कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। धुर ग्रामीण हलकों में आज भी स्त्रियां डायन बताकर मार दी जाती हैं। उन तक शिक्षा का उजियारा नहीं पहुंचा है, लिहाजा वे अंधविश्वासों और रूढ़ियों से घिरी हैं। उनके पास निर्णय के अधिकार नहीं हैं। महिलाओं की उन्नति की बाहरी पहल से जो महिलाएं सरपंच बना दी गई हैं, उनमें से भी कई को घर में बैठाकर निर्णय उनके पति ही लेते हैं। हां, इस पहल की वजह से कुछ ऐसी महिलाएं जरूर सामने आई हैं, जिनका जुझारूपन यह अवसर मिले बिना पता ही न चलता। कस्बों की लड़कियां अब पढ़ने लगी हैं। शहरों में महिलाएं बड़े-बड़े पदों पर काम कर रही हैं। उन कामों में भी उन्होंने अपनी जबरदस्त पैठ बनाई है, जो पारंपरिक रूप से महिलाओं के क्षेत्र नहीं माने जाते थे। लेकिन भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में स्त्रियों को लेकर अनेक पूर्वग्रह हैं, जो अभी मिटे नहीं हैं। औरत की अक्ल चोटी में होती है, जैसे मुहावरे अब भी उतनी ही ढिठाई और बेशर्मी से बोले जाते हैं। उनके पहनने-ओढ़ने, उठने-बैठने पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगाए जाते हैं। बहुत जगहों पर समान काम के लिए उन्हें पुरुषों से कम वेतन और शून्य श्रेय दिया जाता है। दहेज, कन्या भ्रूण हत्या और बलात्कार जैसे अपराधों के लिए भारत दुनिया भर में कलंकित हो चुका है। इनसे निपटने के लिए नए कानून लाने की तैयारियां भी हो रही हैं। मगर जब तक संपूर्ण समाज का रुख नहीं बदलता, जब तक हमारी मानसिकता नहीं बदलती, महिलाओं का बराबरी का इंसान समझे जाने का सपना अधूरा रहेगा।

Wednesday, 6 March 2013

एक और घोटाला का अंकुरण

यूपीए सरकार के घोटालों की लंबी फेहरिस्त में अब किसान कर्ज माफी घोटाला भी जुड़ गया है। २००९ के आम चुनाव के पहले मनमोहन सरकार ने किसानों के ५२ हजार करोड़ रुपए के कर्ज माफ किए थे। अब कैग की जांच-पड़ताल में पाया गया कि इस कर्ज माफी योजना में अपात्रों के कर्ज को माफ कर दिया गया और कई पात्र लोगों को इस योजना का लाभ नहीं मिला। कैग की नमूना जांच के आधार पर माना जा रहा है कि इसमें लगभग १० हजार करोड़ रुपए का घोटाला हुआ है। राजनेताओं व बैंकों के अधिकारियों की मिलीभगत से उन लोगों के भी कर्ज माफ कर दिए गए, जिन्होंने वाहन खरीदने या घर बनाने के लिए कर्ज लिया था। कर्ज माफी की योजना देश के उन जिलों में लागू की गई थी, जहां कर्ज के बोझ में डूबे किसान आत्महत्या कर रहे थे। कैग ने पाया कि बैंकों के पास दस्तावेजी रिकॉर्ड भी मौजूद नहीं हैं, जिनके आधार पर कर्ज माफ करने का निर्णय लिया गया। कैग को उपलब्ध कराए गए कई दस्तावेजों पर लिखे आंकड़ों में फेरबदल किया गया था। कई लोग कर्ज माफी के लिए निर्धारित मानदंडों को पूरा नहीं करते थे। यूपीए लोकसभा चुनाव जीतने के लिए इस कदर कमर कसे हुए था कि अपात्रों को भी कर्ज माफी का लाभ दे दिया गया। कैग की रिपोर्ट में हुए खुलासे के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना अनुचित नहीं होगा कि इस घोटाले में राजनेताओं व बैंक अफसरों की संलिप्तता रही होगी। दिशा-निर्देशों का उल्लंघन करते हुए निजी व्यावसायिक बैंकों के कर्जदारों के कर्ज भी माफ कर दिए गए। वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग ने बिना किसी दस्तावेजी प्रमाण के अरबन कोऑपरेटिव बैंक से जुड़े ३३५ करोड़ रुपए की कर्ज माफी का दावा मंजूर कर लिया। कैग की रिपोर्ट ने वित्त मंत्रालय को कठघरे में खड़ा कर दिया है। संसद में विपक्षी दलों की यह मांग पूरी तरह जायज है कि कैग की रिपोर्ट को आधार बनाकर इस घोटाले की सीबीआई जांच कराई जाए। संसद की लोकलेखा समिति इस घोटाले के आपराधिक पहलुओं की जांच करने में सक्षम नहीं है। यदि मनमोहन सरकार ने इस घोटाले की लीपापोती करने की कोशिश की तो उसे भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ेगा। सरकार के सामने विश्वसनीय जांच कराने का आदेश देने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है।

Tuesday, 5 February 2013

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश 2013 जारी किया

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश 2013 जारी किया



राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने महिलाओं के विरुद्ध यौन हिंसा के मामलों से कारगर ढंग से निपटने के लिए एक आपराधिक कानून (संशोधन) अध्यादेश 2013 को 3 फरवरी 2013 को जारी किया. इसमें बलात्कार पीड़िता की हत्या के मामले में मृत्युदंड का प्रावधान किया गया. अध्यादेश पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद यह पूरे देश में लागू हो गया, लेकिन 6 माह के भीतर इस अध्यादेश को संसद से पास करवाया जाना अनिवार्य है.

इससे पहले केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने इस अध्यादेश को मंजूरी प्रदान की थी. 16 दिसंबर 2012 के दिल्ली सामूहिक दुष्कर्म मामले को देखते हुए सरकार ने न्यायाधीश जेएस वर्मा समिति का गठन किया था और महिलाओं के खिलाफ अपराधों से कारगर ढंग से निपटने के उपायों के बारे में रिपोर्ट देने का निर्देश दिया था.

अध्यादेश के मुख्य बिंदु:
• अध्यादेश में महिलाओं के खिलाफ सभी प्रकार के यौन अपराधों की परिभाषा का विस्तार करने के लिए बलात्कार शब्द के स्थान पर यौन हमले को आपराधिक कानून में शामिल करने का प्रवधान है.
• अध्यादेश में भारतीय दंड संहिता, आपराधिक प्रक्रिया संहिता और साक्ष्य अधिनियम जैसे अपराध कानूनों में संशोधनों को भी शामिल किया गया.
• अध्यादेश में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), दंड संहिता प्रक्रिया (सीआरपीसी) और साक्ष्य अधिनियम में संशोधन का प्रावधान है. इसमें महिलाओं का पीछा करने, ताक-झांक, तेजाब फेंककर हमला करने, अभद्र भाव भंगिमा यथा शब्दों और अनुचित तरीके से स्पर्श करने को लेकर सजा बढ़ाने का प्रावधान है.
• इसमे वैवाहिक बलात्कार को भी इसके दायरे में लाया गया है.
• अध्यादेश में बलात्कार के उन मामलों में मौत की सजा का प्रावधान किया है जिसमें पीड़िता की मृत्यु हो जाती है या वह स्थायी रूप से कोमा में चली जाती है. इस तरह के मामलों में न्यूनतम 20 वर्ष के कारावास की सजा का प्रावधान है, जिसे दोषी के आजीवन कारावास या मृत्यु तक बढ़ाया जा सकता है. इस संबंध में विशेषाधिकार न्यायालय को प्रदान किया गया.
• 18 साल से कम उम्र की महिलाओं का आरोपी के साथ आमना-सामना नहीं कराया जाएगा लेकिन जिरह के प्रावधानों को बरकरार रखा गया है.
• अगर कोई सरकारी सेवक यौन अपराध के मामले में सहयोग नहीं करता है या कानूनी प्रक्रिया को नुकसान पहुंचाता है तो उसे कारावास की सजा देने की सिफारिश की गई है.
• अगर तेजाब हमले का सामना कर रही महिला आत्मरक्षा में आरोपी की हत्या कर देती है तो उसे आत्मरक्षा के अधिकार के तहत सुरक्षा मिलेगी.

भारत के संविधान का अनुच्छेद 123:

भारत के संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत राष्ट्रपति को उस समय अध्यादेश द्वारा विधान बनाने की शक्ति है जब उस विषय पर तुरंत ही संसदीय अधिनियमिति बनाना संभव नहीं है.

मीडिया स्वनियमन ढकोसला है : मार्कण्डेय काटजू



मीडिया स्वनियमन ढकोसला है : मार्कण्डेय काटजू

अभिमन्यु कुमार
नई दिल्ली, १६ जनवरी
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा स्वनियमन की वकालत करना और उसका अभ्यास करना, सामाजिक ज़वाबदेही से बचने की एक चाल है”. ये बातें पूर्व न्यायमूर्ति और प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष मार्कण्डेय काटजू ने भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली में आयोजित एक सम्मेलन में कही. सम्मेलन का विषय मीडिया पर स्वनियमन बनाम वैधानिक नियमन था। उन्होने कहा कि पूर्ण रूप से अनियंत्रित इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जन सारोकार के मुद्दे के प्रति सही ढ़ंग से अपनी जिम्मेदारी नही निभा रहा है बल्कि पैसे की उगाही में ज्यादा ध्यान दे रहा है. ज़ी न्यूज-जिंदल विवाद इसका उदाहरण है. उन्होने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से पेड न्यूज और अन्य कमियों को दूर करने के लिए भारतीय प्रेस परिषद् को मीडिया परिषद् में परिवर्तित कर दिया जाना चाहिए. मीडिया परिषद् प्रभावी ढंग से काम कर सके इसके लिए उसे कड़ी सजा देने और लाइसेंस को रद्द करने के अधिकार देने चाहिए.
काटजू ने आगे कहा कि मीडिया देश के वास्तविक मुद्दों जैसे गरीबी, कुपोषण आदि पर बात नही करता. वह सनसनी फैलाने वाले कार्यक्रम प्रसारित कर टीआरपी बढ़ाने की जुगात में लगा रहता है. उन्होंने अन्ना हजा़रे के आन्दोलन का उदाहरण देते हुए कहा कि मीडिया ने इस आन्दोलन को सनसनी तौर पर खड़ा किया जिसका अंतिम परिणाम शून्य रहा. क्या इस आन्दोलन के बाद देश से भ्रष्टाचार एक प्रतिशत भी कम हुआ? उन्होंने दिल्ली सामूहिक बालात्कार मामले के टीवी कवरेज पर भी प्रश्न खड़े किये और कहा कि लगातार पंद्रह दिनों तक दिन-रात इस मुद्दे को दिखाना उचित था? क्या उन पंद्रह दिनों में देश भर में यही एक मुद्दा था?
उन्होने पेड न्यूज के मुद्दे पर कहा कि मीडिया पेड न्यूज को रोकने का प्रयास नही करती है, उल्टा इसे बढ़ावा दे रही है.
काटजू ने अंत में मीडिया काउंसिल के रुप में अधिकार प्राप्त स्वायत्त संस्थान की स्थापना को समय की आवश्यकता बताया जो बेलगाम मीडिया पर अंकुश लगा सके, उसके गलतियों पर उसे दंडित कर सके और जरुरत पड़ने पर उनके लाइसेंस को रद्द कर सके.
सम्मेलन में वरिष्ठ पत्रकार और द हिंदू के पूर्व संपादक एन. राम ने काटजू की बातों पर सहमति जताते हुए कहा कि प्रत्येक मीडिया संस्थान को एक स्वतंत्र लोकपाल रखना चाहिए जो समाचार पत्रों और चैनलों की सामग्री पर नज़र रख सके. द हिंदू इस नीति का पालन करता है  दूसरे संस्थानों को भी इस नीति का पालन करना चाहिए. तभी मीडिया संस्थान जनता के प्रति उत्तरदायी बना पायेगा. एन राम ने मीडिया पर सरकारी नियंत्रण को ख़ारिज करते हुए कहा कि सरकारी नियंत्रण अभिव्यक्ति की आज़ादी को प्रभावित करेगा. उन्होने स्व नियमन को निरंकुश बताया.
अंग्रेजी समाचार चैनल हेडलाइंस टुडे के प्रबंध सम्पादक राहुल कंवल ने स्वनियमन के पक्ष में  कहा कि मीडिया की अभिव्यक्ति की आज़ादी की रक्षा स्वनियमन ही कर सकता है. राष्ट्रीय प्रसारण मानक संघ (एनबीएसए) समाचार चैनलों के सामग्री पर कड़ी नज़र रखता है और चैनल की गलतियों पर उसे दंड भी देता है. इस संस्थान ने कई चैनलों के खिलाफ कड़े फैसले भी सुनाये हैं. मीडिया पर सरकारी नियंत्रण सेंसरसिप लगाने और उसकी अभिव्यक्ति पर अकुंश लगाने जैसा होगा. सरकारी नियंत्रण या सरकार के अधीन स्वायत्त संस्थान यदि मीडिया का नियमन करेगी तो निजी चैनल दूरदर्शन की तरह काम करने लगेगा और सरकारी अधिकारी उन्हें बतायेंगे कि क्या दिखाना है और क्या नही. मीडिया का स्वनियमन ही अभिव्यक्ति की आजादी को खतरे से दूर रख सकता है.
किसी मुद्दे को सनसनी के रुप में प्रस्तुत करने के आरोप पर राहुल कंवल ने कहा कि दिल्ली सामूहिक दुष्कर्म मामले में मीडिया ने युवाओं के गुस्से को महसूस किया और उसे देश के सामने रखा जिसका साकारात्मक प्रभाव सब के सामने है. इतना ही नही मीडिया की साकारात्मक पहल के कारण ही आज समाज भ्रष्टाचार और महिला आजादी पर खुलकर बात कर रहा है.
मार्कण्डेय काटजू ने राहुल कंवल की एनबीएसए के कार्यों की प्रशंसा पर सवाल उठाते हुए कहा कि एनबीएसए को लाइसेंस रद्द करने के अधिकार होने चाहिए तभी यह सही मायने में कार्य कर पायेगी. जब तक चैनलों में लाइसेंस रद्द होने और कड़े दंड का डर नही होगा तब तक समाचार चैनल बकवास काम करता रहेगा. एन. राम ने सलाह दिया कि सारे कार्यरत मीडिया कर्मी को एनबीएसए से त्यागपत्र दे देना चाहिए तभी यह सही मायने में स्वनियमन कर सकेगा. नही तो व्यवसायिक हित हमेशा समाजिक हित पर हावी रहेगा.
राजनीतिक समाजशास्त्री दिपांकर गुप्ता ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि मीडिया क्या न करे इसकी भी परिभाषा तय की जानी चाहिए. उन्होने कहा कि एनबीएसए टीवी पत्रकारिता को उत्तरदायी बनाने की दिशा में बेहतर काम कर रहा है.
सीएसडीएस के परियोजना निदेशक विपुल मुद्गल ने कहा कि देश में लगभग ३०० चैनल राजनेताओं के पास है जिसका प्रयोग वे जनमत को प्रभावित करने के लिए करते हैं. उन्होने मीडिया संकेंद्रन पर भी चिंता जाहिर की. स्वनियमन के मुद्दे पर कहा कि मीडिया वैधानिक समर्थन प्राप्त स्वतंत्र संस्थान के अधीन काम करे. उन्होंने जोर देकर कहा कि पहले नियमन और बाद में स्वनियमन की बात की जानी चाहिए। मुद्गल के मुताबिक मीडिया का नियमन जनता द्वारा किया जाना चाहिए। उन्होंने ब्राजील का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां पर मीडिया के लिए एक सिविल चार्टर बनाया गया है जो मीडिया पर जनता का नियंत्रण स्थापित करता है। उन्होंने कहा कि स्वनियमन वैधानिक ढांचे के भीतर ही होना चाहिए.
सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रुप में देश के पूर्व मुख्य न्यायधीश एम.वेंकटचलैया ने कहा कि वर्तमान परिस्थिति को देखते हुए मीडिया के लिए नियामक संस्थान की आवश्यकता है. सरकारी नियंत्रण  मीडिया के स्वतंत्र विचारों पर अंकुश लगा सकता है. उन्होने आगे कहा कि भले ही हमारे बीच कितने मामलों पर असहमति हो लेकिन इस पूरे मुद्दे पर जरूर सहमति है कि मीडिया का नियमन सरकार के द्वारा नहीं किया जाना चाहिए।